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सीएए: केंद्र ने कहा- नीतिगत निर्णयों में दखल नहीं दे सकता कोर्ट

  • CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 200 याचिकाएं
  • MHA ने 129 पन्नों का दाखिल किया हलफनामा

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए करीब 200 याचिकाएं दायर की गई हैं. मंगलवार को गृह मंत्रालय ने इन याचिकाओं के जवाब में अपनी प्रतिक्रिया के साथ एक ‘प्रारंभिक हलफनामा’ पेश किया है.

129 पेज के इस हलफनामे में याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए विभिन्न वैधानिक सवालों के जवाब दिए गए हैं. हालांकि हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि उत्तर पूर्वी राज्यों की जनजातीय आबादी के साथ हुए समझौतों से संबंधित सवालों के जवाब एक अलग हलफनामे में दिए जाएंगे. हलफनामे में कहा गया है कि तीन पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान नीतिगत मामला है और नीतिगत निर्णयों में अदालत दखल नहीं दे सकती.

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इसमें कहा गया है, “देश की नागरिकता और इससे संबंधित अन्य मुद्दे न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं हो सकते है और यह तर्कसंगत नहीं होगा. ऐसे निर्णय कार्यपालिका की संसदीय विधायी नीति का परिणाम हैं- विदेश नीति के निर्णय के लिए संवैधानिक न्यायालयों के पास मापदंडों की जांच करने के लिए अपेक्षित विशेषज्ञता नहीं हो सकती है.”

इस हलफनामे में आगे कहा गया है कि सीएए “संशोधन के अधिनियमित होने से पहले मौजूद किसी भी मौजूदा अधिकार पर रोक नहीं लगाता है और आगे भी किसी तरह से भारतीय नागरिकों के किसी भी कानूनी, लोकतांत्रिक या धर्मनिरपेक्ष अधिकारों को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करता है.”

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अनुच्छेद 14 और भेदभावपूर्ण वर्गीकरण के मसले पर गृह मंत्रालय ने तर्क दिया है कि वर्गीकरण विशिष्ट तर्क के आधार पर किया गया है- विशेष रूप से तीन देशों में जहां राष्ट्र का एक ‘धर्म’ है, और वहां पहचान किए गए समुदायों को अल्पसंख्यकों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है. गृह मंत्रालय ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के संबंध में विशेष नियम 1950 से हैं. मंत्रालय का यह भी तर्क है कि “वर्गीकृत समुदायों” का भारत से “ऐतिहासिक और सांस्कृतिक” संबंध है.

इसमें कहा गया है कि पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश और पश्चिमी पाकिस्तान यानी मौजूदा पाकिस्तान के वर्गीकृत अल्पसंख्यक बंटवारे के बाद से विशेष प्रावधानों का लाभ उठाते रहे हैं… वे प्रवासी आर्थिक प्रवासी नहीं हैं; बल्कि वे उत्पीड़न के कारण अपने घर से बाहर कर दिए गए हैं…”

कुछ अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को सीएए से बाहर रखने के सवाल पर मंत्रालय ने कहा है कि जिन समुदायों को सुरक्षा दी जा रही है उनके भारत से “ऐतिहासिक” संबंध हैं.

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कुछ याचिकाओं में अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और रिफ्यूजी के अधिकार से जुड़े इंटरनेशनल कंवेंशन का मुद्दा उठाया गया है. इस पर गृह मंत्रालय का तर्क है कि भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के रिफ्यूजी कंवेंशन पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए. सरकार का यह भी तर्क है अवैध प्रवासी सीएए के प्रावधानों को चुनौती नहीं दे सकते.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा है कि नेशनल ​रजिस्टर ऑफ सिटीजंस की तैयारी किसी भी संप्रभु राष्ट्र के जरूरी प्रक्रिया है ताकि यह पहचान की जा सके कि कौन देश का नागरिक है और कौन नहीं है. सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि अधिकांश देशों में नागरिकों के रजिस्टर बनाने की एक प्रणाली है और यहां तक कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने की व्यवस्था है.

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